वाह! रे पत्रिका... कर्मचारियों को पैसा दे नहीं रहे और खुद सरकार से भीख मांग रहे, अब बताइए कुत्ता कौन ?

जयपुर। राजस्थान पत्रिका ने बुधवार के अंक में मुख्य पृष्ठ पर 'लोकसभा में उठा राजस्थान पत्रिका के सरकारी विज्ञापनों पर रोक का मामला' शीर्षक से खबर प्रकाशित की है। इसमें पत्रिका प्रबंधन ने सांसद कांतिलाल भूरिया के जरिए अपने सरकारी विज्ञापनों के रोक का मामला लोकसभा में उठाया है। इस मांग में पत्रिका के मालिकों की पीड़ा जगजाहिर हो रही है कि वे हर तरीके से सरकार से उन्हें कुछ बोटी डालने की गुहार कर रहे हैं। अपने आपको निर्भीक, निष्पक्ष अखबार बता रहे हैं। अब इन पत्रिका के सफेदपोश मालिकों से पूछिए कि आप कर्मचारियों का मजीठिया वेज बोर्ड के नाम पर करोड़ों रुपए दबाकर बैठे हैं। मजीठिया मांगने वालों को बर्खास्त, सस्पेंड और ट्रांसफर कर रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट की अवमानना कर रहे हैं और अपने आप को धूल का धुला हुआ बता रहे हैं। अब इनसे कोई पूछे कि आप क्यों अपने कर्मचारियों का जायज पैसा नहीं दे रहे, जबकि आप स्वयं को सरकारी विज्ञापन नहीं देने का रोना रो रहे हैं, जबकि सरकारी विज्ञापन देना या नहीं देना सरकार के विवेक पर निर्भर है। यह कोई कानून नहीं है कि कोई अखबार चला रहा है और उसे सरकारी विज्ञापन देना ही पड़ेगा। यह सरकार की मर्जी पर है कि वह किसी अखबार को विज्ञापन दे और किस को नहीं दे। पत्रिका के मालिका एक तरह से सरकार से विज्ञापनों के नाम पर सीधे-सीधे बोटी की मांग कर रहे हैं। अब पत्रकारों को कुत्ता कहने वालों से पूछिए कि असल में कुत्ता कौन है। एक बात और इस खबर से यह तो जगजाहिर हो गया है कि अखबार वालों को जनता की खबरों से कोई लेना-देना नहीं है, वे तो अखबार की आड़ में सरकारी कृपा प्राप्त करना चाहते हैं। जबकि निष्पक्ष, निर्भीक पत्रकारिता का दंभ भरने वाले पत्रिका प्रबंधन को यह खबर प्रकाशित करने के बजाय जनता के हितों और सरकार के घोटालों की खबर प्रकाशित करनी चाहिए थी। ये दोनों ही कार्य उससे हो नहीं रहे हैं और कभी किस नेता से तो कभी किस नेता के मार्फत सरकार से विज्ञापन देने की याचना कर रहे हैं।