इन महाशयों को टीवी चैनल का नहीं अनुभव, फिर भी पत्रिका टीवी कराएंगे लॉन्च

जयपुर। बन्दर को हल्दी की गांठ मिल गई तो वह पंसारी बन बैठा। यह कहावत तो आपने खूब पढ़ी और सुनी होगी। यह कहावत अब सटीक बैठ रही है राजस्थान पत्रिका में। पत्रिका मालिकों ने ऑनलाइन टीवी चैनल की कमान तीन ऐसे व्यक्तियों के हाथ में दे दी, जिनका टीवी चैनल से दूर-दूर तक का वास्ता नहीं है। पत्रिका ने तीन लोगों के भरोसे अपने ऑनलाइन टीवी चैनल को छोड़ दिया है। इनकी योग्यता जानकर हर कोई अपने बाल नोंचने को मजबूर हो जाएगा।

सर्कुलेशन संभला नहीं अब टीवी की जिम्मेदारी

इनमें से जिस व्यक्ति को मुखिया बनाया गया है, उन महाशय का सम्पादकीय कार्य से अभी तक कोई वास्ता नहीं था। ये अभी तक पत्रिका में सर्कुलेशन की कमान संभाल रहे थे। अब इनको सम्पादकीय कार्य और वो भी ऑनलाइन टीवी की कमान देने का निर्णय हास्यास्पद है। इन महाशय से सर्कुलेशन तो ठीक से संभल नहीं रहा था। सर्कुलेशन बढ़ाने के लिए सम्पादकीय विभाग की हाथा-जोड़ी कर रहे थे।

अधिकारी दिखते ही दौड़ लगाते हैं जनाबे आली

अब बाकी बचे दो जनों में से एक जनाबे आली ने जरूर कुछ दिन पत्रिका केबल टीवी का कार्य देखा है। लेकिन, वह अनुभव इतना नहीं है कि वे टीवी चैनल को सक्सेसफुल चला सकें। वैसे भी इन जनाबे आली की इमेज कार्य करने की कम अधिकारियों के आगे-पीछे दौड़ने की ज्यादा है। अगर अधिकारी दिख जाए तो फिर इनके पैरों में जेट विमान के पहिए लग जाते हैं और खूब कागज लेकर इधर से उधर अधिकारी के सामने से कई बार दौड़ लगाते हैं। जिससे अधिकारी की नजर इन पर पड़ जाए और उनका आशीर्वाद इनको मिल जाए। उस समय ऐसा लगता है कि पूरे ऑफिस में ये जनाब ही कार्य करते हैं और तो सब घूमने आते हैं।

इन सम्पादक का तो भगवान ही मालिक

अब जो तीसरे महोदय बचते हैं, उनका तो भगवान ही मालिक है। कहने को तो वे हैं तो सम्पादक। लेकिन, उन्हें टीवी चैनल की तो छोड़िए प्रिंट में भी कार्य करने का ज्ञान नहीं है। अपनी मिजाजपुर्सी हरकतों से वे सम्पादक की कुर्सी पर तो आसीन हो गए हैं, लेकिन, उन्होंने अपने अभी तक के कॅरियर में ना तो रिपोर्टिंग की है और ना ही डेस्क का कार्य। ऐसे में उन्हें टीवी चैनल में अहम भूमिका दिए जाना कई सवाल खड़े करती है। मसलन- क्या पत्रिका प्रबंधन के पास अच्छे और अनुभवी कर्मचारियों की कमी है। क्या पत्रिका में सम्पादकीय समझ से ज्यादा मिजाजपुर्सी में माहिर व्यक्ति को वरीयता दी जाती है। हालांकि, इन तीनों को टीवी चैनल लॉन्च कराने की जिम्मेदारी देकर पत्रिका मालिकों ने अच्छा ही किया है। उन्हें पता तो चलेगा कि हर जगह मक्खनबाज व्यक्तियों से कार्य नहीं चलाया जा सकता है, कई जगह कार्य में दक्ष लोग ही आउटपुट देते हैं। वैसे भी किसी ने खूब कहा है कि जिसका काम उसको साजे और करे तो डंका बाजे। अब देखने वाली बात यह है कि पत्रिका टीवी का डंका बजता है या फिर प्रबंधन के इस निर्णय का।