सुप्रीम कोर्ट का फैसला: लेबर कोर्ट में लडऩे वाला ही पाएगा मजीठिया

जयपुर। मजीठिया वेजबोर्ड लागू नहीं करने पर दायर अवमानना याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट ने आज सोमवार को फैसला सुनाया है। सुप्रीम कोर्ट के माननीय न्यायाधीश रंजन गोगोई व जस्टिस नवीन सिन्हा की खंडपीठ ने दोपहर तीन बजे यह फैसला सुनाते हुए कहा कि वेजबोर्ड से संबंधित मैटर संबंधित लेबर कोर्टों में सुने जाएंगे।
वेजबोर्ड में बन रहा पत्रकारों व गैर पत्रकारों का एरियर समेत व अन्य वेतन भत्ते संबंधित लेबर कोर्ट या अन्य कोर्ट में ही तय किए जाएं। संबंधित कोर्ट इन पर त्वरित फैसला करें। वेज बोर्ड में सबसे विवादित बिंदू 20-जे के संबंध में कोर्ट ने कहा कि 20-जे को लेकर एक्ट में कोई विशेष प्रावधान नहीं है। इसलिए इसका फैसला भी संबंधित कोर्ट ही तय करेगी। कोर्ट ने यह भी कहा कि अवार्ड को गलत समझने के चलते मीडिया संस्थानों पर कंटेम्प्ट नहीं बनती। अवमानना याचिकाओं में दायर ट्रांसफर, टर्मिनेशन व अन्य प्रताडऩाओं के संबंध में सुप्रीम कोर्ट ने कोई निर्देश नहीं दिए। सुप्रीम कोर्ट के 36 पेजों में दिए गए फैसले से साफ है कि कोर्ट ने मीडिया संस्थानों के खिलाफ कटेम्प्ट को नहीं माना लेकिन साफ कहा भी है कि कर्मचारियों को वेजबोर्ड दिया और वेजबोर्ड से संबंधित एरियर वेतन भत्ते कर्मचारियों की प्रताडऩा आदि से संबंधित मामलों की जिम्मेदारी लेबर कोर्ट पर डाली है। अब लेबर कोर्ट ही पत्रकारों व गैर पत्रकारों के मामले में फैसला देगा। इससे स्पष्ट है कि जिसे वेजबोर्ड चाहिए उसे लेबर कोर्ट ही जाना ही होगा।

गौरतलब है कि करीब ढाई साल से वेजबोर्ड के लिए देश के हजारों पत्रकार व गैर पत्रकार सुप्रीम कोर्ट में कानूनी लड़ाई लड़ रहे थे। जस्टिस मजीठिया वेजबोर्ड की सिफ ारिशों को लागू नहीं करने पर देश के नामचीन मीडिया संस्थान राजस्थान पत्रिका, दैनिक भास्कर, जागरण, अमर उजाला, पंजाब केसरी समेत कई मीडिया संस्थानों के खिलाफ पत्रकारों व गैर पत्रकारों ने सुप्रीम कोर्ट में अवमानना याचिका लगाई। दो साल सुनवाई के बाद पिछले महीने कोटज़् ने फैसला सुरक्षित रख लिया था। पत्रकारों की ओर से सीनियर एडवोकेट कॉलिन गोंजालविस, परमानन्द पांडे ने पैरवी की, वहीं मीडिया संस्थानों की तरफ से देश के नामचीन वकील मौजूद रहे।

– यह है मजीठिया वेजबोर्ड प्रकरण
सुप्रीम कोर्ट ने अपने ऐतिहासिक फैसले में 7 फरवरी, 2014 को मजीठिया वेतन आयोग की सिफ सिफारिशों के अनुरुप पत्रकारों व गैर पत्रकार कमिज़्यों को वेतनमान, एरियर समेत अन्य वेतन परिलाभ देने के आदेश दिए हैं। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिशों के अनुरुप नवम्बर 2011 से एरियर और अन्य वेतन परिलाभ देने के आदेश दिए हैं, लेकिन समानता, अन्याय के खिलाफ लडऩे, सच्चाई और ईमानदारी का दंभ भरने वाले राजस्थान पत्रिका, दैनिक भास्कर, दैनिक नवज्योति, महानगर टाइम्स, राष्ट्रदूत, ईवनिंग पोस्ट, ईवनिंग प्लस, समाचार जगत, सांध्य ज्योति दपज़्ण आदि कई दैनिक समाचार पत्र है, जिन्होने सुप्रीम कोर्ट के आदेशों की पालना नहीं की। सुप्रीम कोर्ट के आदेशों की धज्जियां उडाते हुए राजस्थान पत्रिका, दैनिक भास्कर जैसे बड़े समाचार पत्रों में तो वहां के प्रबंधन ने मानवीय पहलु और कानूनों को ताक में रखकर अपने कर्मचारियों से जबरन हस्ताक्षर करवा लिए, ताकि उन्हें मजीठिया वेजबोर्ड के तहत वेतन परिलाभ नहीं दे पाए। हस्ताक्षर नहीं करने वाले कर्मचारियों को स्थानांतरण करके प्रताडि़त किया गया। सैकड़ों पत्रकारों व गैर पत्रकारों के दूरस्थ क्षेत्रों में तबादले कर दिए गए।

सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकारों, श्रम विभाग और सूचना व जन सम्पर्क निदेशालयों को मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिशें लागू करने के लिए जिम्मेदारी तय की है, लेकिन इन्होंने कोई पालना नहीं करवाई। जबकि मजीठिया वेजबोर्ड बनने के साथ ही केन्द्र सरकार ने समाचार-पत्रों पर वेतन-भत्तों का बोझ नहीं पड़े, इसके लिए विज्ञापन दरों में बढ़ोतरी समेत कई अन्य रियायतें प्रदान कर दी थी। वषज़् 2008 से देश-प्रदेश के समाचार पत्रों में सरकारी विज्ञापन बढ़ी दरों पर आ रहे हैं और दूसरी रियायतें भी उठा रहे हैं।

छह साल में विज्ञापनों से समाचार-पत्रों ने करोड़ों-अरबों रुपए कमाए, लेकिन इसके बावजूद समाचार-पत्र प्रबंधन अपने कमज़्चारियों को मजीठिया वेजबोर्ड के तहत वेतन परिलाभ नहीं दे रहे हैं। जब आदेशों की पालना नहीं हुई तो देश भर के पत्रकारों व गैर पत्रकारों ने सुप्रीम कोर्ट में अवमानना याचिकाएं लगाकर मीडिया संस्थानों के खिलाफ मोर्चा खोला। यूपी, मध्यप्रदेश, राजस्थान, गुजरात, दिल्ली, छत्तीसगढ़, बिहार आदि राज्यों से सवाज़्धिक अवमानना याचिकाएं लगी।