सुप्रीम कोर्ट का आदेश कर्मचारियों के ही पक्ष में, उत्तरप्रदेश से मीडिया मालिकों की घेराबंदी शुरू

जयपुर। मजीठिया मामले में सुप्रीम कोर्ट में 19 जुलाई को हुई सुनवाई के बाद कर्मचारियों में निराशा का माहौल घर कर गया था। लगभग सभी कर्मचारी कह रहे थे कि सुप्रीम कोर्ट ने मीडिया मालिकों की बात सुनी है और उनके पक्ष में आदेश दिया है। कोई कह रहा था कि मीडिया मालिकों ने पैसे के दम पर सुप्रीम कोर्ट को भी मैनेज कर लिया है। अब तो मजीठिया दूर की कौड़ी हो गया है। यह तो अब मिलना मुश्किल है। इस तरह सहित कई अन्य कयास मजीठिया का केस लड़ रहे कर्मचारियों ने लगाए थे। 19 जुलाई को मेरा दिन कुछ यूं गुजरा कि मेरे पास फोन आने का सिलसिला थम ही नहीं रहा था और सभी इसी तरह की बातें मुझे कह रहे थे। मैंने सभी को तसल्ली से सुना और तुरंत किसी तरह की टिप्पणी देने से बचा। मैंने सभी से कहा कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश का इंतजार करो। तुरंत ही कोई भी अधूरी खबर चलाने से बचा, ताकि कर्मचारियों में कोई गलतफहमी ना हो जाए। अब सुप्रीम कोर्ट का आदेश मेरे हाथ में हैं और अब मैं पूरे दावे के साथ कह सकता हूं कि सुप्रीम कोर्ट का आदेश कर्मचारियों के पक्ष में ही है। कर्मचारी अपने आप पर निराशा, हताशा और नाउम्मीदी को हावी ना होने दें।

दूसरे मीडिया मालिक भी डरेंगे

सुप्रीम कोर्ट के ताजा आदेश में साफ लिखा है कि हमें कई राज्यों से मजीठिया मामले पर स्टेट्स रिपोर्ट प्राप्त हुई है। हम इन सभी की समीक्षा एक साथ नहीं कर सकते हैं। इसलिए हम पांच-पांच राज्यों का ग्रुप बनाकर उनकी समीक्षा करेंगे। पांच राज्यों के पहले बैच में उत्तरप्रदेश, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश , नगालैण्ड और मणिपुर की स्टेट्स रिपोर्ट की समीक्षा करेंगे। इस दौरान सम्बंधित राज्यों के श्रमायुक्त उपस्थित रहेंगे। अब इसका मतलब देखा जाए तो साफ पता चलता है कि कोर्ट ने मीडिया मालिकों की कतई नहीं सुनी। अगर ऐसा होता तो पहले बैच में उत्तरप्रदेश और उत्तराखंड को नहीं लेता। दैनिक जागरण, अमर उजाला, हिन्दुस्तान जैसे नामचीन अखबार यहीं से ज्यादा निकलते हैं। उत्तरप्रदेश और उत्तराखंड के श्रमायुक्तों ने सबसे लेट और गोलमोल रिपोर्ट दी थी। ऐसे में इनका नम्बर पहले पर लेने का मतलब है कि सुप्रीम कोर्ट का रूख इनके प्रति सख्त है। इस बात की जानकारी तो आप सभी को होगी कि मजीठिया मामले में मीडिया मालिकों के ग्रुप का मुखिया भी दैनिक जागरण ही है। ऐसे में उसका नम्बर पहले आता है और सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट का रवैया और सख्त होता है तो इसका डर बाकी राज्यों के मीडिया मालिकों पर भी होगा।

कानूनी प्रावधानों के तहत होगी 20 जे पर बहस

23 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट 20 जे पर भी मीडिया मालिक और कर्मचारियों के वकीलों की दलीलें सुनेगा। अब खास बात यह है कि 20 जे पर जो बहस होगी, वह वर्किंग जर्नलिस्ट एक्ट 1955 के कानूनी प्रावधानों के अनुरूप होगी। यानी कानूनी प्रावधान के हिसाब से 20 जे की धारा का क्या मतलब है। एक्ट में साफ लिखा है कि 20 जे की धारा का मतलब है कि ऐसा कोई भी समझौता, जो कर्मचारी को वेज बोर्ड के तय मानकों से कम वेतन लेने की बात कहता हो, वह अमान्य है। 20 जे की धारा वेज बोर्ड से अधिक वेतन पाने वाले कर्मचारियों के हितों की रक्षा करता है। 20 जे की धारा पर बहस के बाद सुप्रीम कोर्ट सम्बंधित राज्यों में वेज बोर्ड लागू होने की जांच करेगा। यानी जो मीडिया मालिक अभी तक जो 20जे की धारा का हवाला देकर सुप्रीम कोर्ट को गुमराह कर रहे थे, अब उनकी भी क्लास लगना शुरू हो जाएगी। साथ ही मीडिया मालिकों के चमचों की भी नींद उड़ गई है। अब उन्हें अपनी नौकरी भी खतरे में दिख रही है। क्योंकि, इन चमचों ने ही मीडिया मालिकों को बरगलाया था।

केस थोड़ा खिंच जरूर गया है, सब्र रखें, सब अच्छा होगा

पांच-पांच राज्यों के ग्रुप बनाने से हरेक राज्य की सुनवाई अच्छे से हो पाएगी, वहीं इससे केस की अवधि भी बढ़ गई हैं। आपको यह इंतजार करना पड़ेगा कि आपके राज्य का नम्बर कब है। आपसे केस उतना ही दूर है, जब तक आपके राज्य का नम्बर नहीं आ जाता। आपके राज्य का नम्बर आते ही आपकी सारी परेशा नियां दूर हो जाएंगी। सुप्रीम कोर्ट ने 23 अगस्त को सुनवाई के लिए जो पांच राज्यों का बैच बनाया है, उसे देखकर यह समझ में आता है कि पांच राज्यों में तीन राज्य तो ऐसे हैं, जहां से सबसे ज्यादा शिकायतें मिलीं हैं, बाकी दो राज्यों से बहुत कम हैं या नहीं हैं। यानी इससे आगे वाले बैच में भी ऐसा ही होगा। उनमें ज्यादा संख्या ऐसे राज्यों की होगी, जहां से शिकायतें ज्यादा आई हैं। मतलब साफ है कि केस उतना ज्यादा भी नहीं खिंचेगा। वैसे सिर्फ 15 राज्य ही ऐसे हैं, जहां से शिकायतें आईं हैं, बाकी राज्यों से तो शिकायतें ही नहीं आई। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट सभी का आदेश तो एक साथ ही अंत में ही देगा। लेकिन, इन पांच राज्यों के मीडिया मालिकों के प्रति यदि सुप्रीम कोर्ट का रूख सख्त रहा तो बाकी राज्यों के मीडिया मालिकों ही हवा निकल जाएगी। इसलिए थोड़ा सब्र रखें, सब अच्छा होगा। किसी ने कहा भी है कि अंत भला तो सब भला।