मटर छील और बथुआ साफ कर मन लगा रहे बड़े भाईसाहब

जयपुर। अरे बाबा...अरे बाबा घुटनों में दर्द है...अरे बाबा...अरे बाबा चला नहीं जाता...अरे बाबा...अरे बाबा मन नहीं लगता...अरे बाबा...अरे बाबा...क्या करूं। ले मटर छील...ले बथुआ साफ कर...ले मैथी साफ कर...। आजकल कुछ ऐसा ही हाल है राजस्थान पत्रिका के मालिक और बड़े भाईसाहब माननीय गुलाब कोठारी का। घुटनों के जवाब देने के बाद उनसे चला नहीं जाता है। एक जगह बैठे-बैठे उनका मन नहीं लग रहा है। पोते-पोतियों के साथ भी कितना मन बहलाएं।

...तो परिवार वालों ने निकाली युक्ति

फिजियोथैरेपिस्ट के साथ और तेल मालिश करने आने वाले के दौरान तो फिर भी मन लग जाता है, लेकिन उसके बाद दिन काटे नहीं कटता है। इसलिए उनका मन भी लग जाए और कुछ घर का काम भी हो जाए। इसलिए परिवार वालों ने ऐसी युक्ति लगाई कि एक पंथ दो काज या फिर यूं कहें आम के दाम गुठलियों के भी दाम मिलने लग गए हैं।

अब लग रहा है पूरा मन

सूत्रों का कहना है कि माननीय बड़े भाईसाहब की धर्मपत्नी ने उनका मन बहलाने के लिए उन्हें मटर छीलने, बथुआ, पालक, मैथी साफ करने का जिम्मा दे दिया है। इससे एक तो घर के कार्य में सहायता मिल जाती है, दूसरा बड़े भाईसाहब का टाइम पास भी हो जाता है। यानी ऑफिस से रिटायरमेंट लेने के बाद अब बड़े भाईसाहब घर के कार्यों में पूरी सहायता कर रहे हैं। इससे खासकर उनकी धर्मपत्नी बड़ी खुश हैं। सूत्रों का कहना है कि रिटायरमेंट से पहले तो बड़े भाईसाहब परिवार के लिए ज्यादा समय नहीं निकाल पाते थे। लेकिन, अब वे परिवार के लिए पूरा समय दे रहे हैं। खैर हम तो बड़े भाईसाहब से यही कहना चाहेंगे कि बने चाहे दुश्मन आपका जमाना, सलामत रहे घराना आपका।