पत्रिका को कर्मचारी शोषण में ओलंपिक का गोल्ड मेडल मिलना चाहिए

आदरणीय भूरिया जी,
नमस्कार,
सुबह-सुबह राजस्थान पत्रिका के प्रथम पेज पर आपकी मीडिया के दमन को लेकर चिंता के विषय में पढ़ा। अच्छा लगा। मीडिया के अधिकारों की बात होनी चाहिए। पुरजोर तरीके से मीडिया की दबती आवाज, अभिव्यक्ति, आजादी आदि-आदि के लिए लड़ना चाहिए। पर, आश्चर्यजनक तो यह है कि आप संपूर्ण मीडिया के लिए लड़े नहीं। एक विशेष अखबार की आपको चिंता हुई। कोई विशेष कारण। आखिर क्या मजबूरी थी? आपने कहा, अखबार के विज्ञापन रोकना लोकतंत्र विरोधी है। यह बात हजम नहीं हुई। आप ही समझाओ लोकतंत्र में कहा उल्लेख है कि अखबार को सरकार का विज्ञापन देना अनिवार्य है। अखबार को सरकार विज्ञापन नहीं देगी तो लोकतंत्र को क्या नुकसान होगा? विज्ञापन रोककर सरकार कैसे मीडिया हाउस पर अंकुश लगा सकती है? क्या सरकार ने अखबार की प्रिंटिंग प्रेस पर ताला लगा दिया या उसके प्रतिनिधियों के सचिवालय में घुसने के पास रद्द कर दिए या रिपोर्टरों को खबर करने से रोका जा रहा है या किसी प्रकार की कानूनी कार्रवाई की है? यदि ऐसा कुछ किया है तो वाकई आपको आवाज ही नहीं उठानी चाहिए, बल्कि सरकार की मुखालफत (आपने खिलाफत शब्द का इस्तेमाल किया, जो गलत है) करनी चाहिए। सर जी सड़क पर उतरकर लड़ें, हम आपके साथ कंधे से कंधा मिलाएंगे।
लेकिन आपने तो ऐसे अखबार के पक्ष में संसद को चुना, जिसे कर्मचारी शोषण में ओलंपिक का गोल्ड मेडल मिलना चाहिए। जो अपना वाजिब हक मांग रहे पत्रकारों का गला घोंटने में अव्वल है। जिसके खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय में अवमानना के 5 केस चल रहे हैं। 200 से ज्यादा पत्रकार-गैर पत्रकार आप ही की सरकार (यूपीए-2) के लागू मजीठिया वेजबोर्ड को पाने के लिए कोर्ट की शरण में हैं। जिनमें 25 से ज्यादा पत्रकार-गैर पत्रकारों को बिना कारण बर्खास्त किया जा चुका है। 40 से ज्यादा को बेघर किया गया है। यह अखबार अपने कर्मचारियों से अमानवीय व्यवहार की सारी हदें तोड़ रहा है। यहां पत्रकारों की तुलना कुत्तों से हो रही है। अखबार पत्रकार नाम के प्राणी को ही यह विलुप्त बनाने पर आतुर है। आप ही बताएं, ऐसे अखबार ने अपने आर्थिक हितों के लिए आपका तो इस्तेमाल नहीं किया?
आप वरिष्ठ राजनेता हैं। आपका जनता में बहुत सम्मान है। आप भारी मतों से विजयी होकर लोकतंत्र के मंदिर में पहुंचे हो। आपसे छोटा से अनुरोध है, जैसे आपने इस अखबार के लिए संसद में आवाज उठाई, उससे थोड़ा कम इस अखबार द्वारा प्रताड़ित पत्रकार-गैर पत्रकारों की भी आप आवाज बनें। हम आपके बहुत-बहुत आभारी रहेंगे।
(देर शाम राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत जी ने भी कुछ ऐसा ही किया, यही सवाल गहलोत जी से भी हैं)
धन्यवाद।
( लेखक विनोद पाठक वरिष्ठ पत्रकार हैं )