सरकारी विज्ञापनों के लिए नतमस्तक पत्रिका प्रबंधन

जयपुर। आपने 'सरकार' नामक हिन्दी फिल्म तो देखी ही होगी। उसमें 'सरकार' अपने दम पर हर किसी को झुका लेती है। हालांकि, उसमें सरकार को माफिया के रूप में चित्रित किया गया था। यहां हम सिर्फ सरकार का रेंफरेस पावर दिखाने के लिए दे रहे हैं। अब बात करते हैं असल मुद्दे की। राजस्थान पत्रिका के मालिकों की पहले राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ की सरकारों से ठनी हुई थी। मुख्यमंत्री और उनके मंत्रियों को भ्रष्टाचार में लिप्त बताते हुए अपने समाचार-पत्र में खूब खबरें प्रकाशित की गई। इनमें काफी खबरें बिना तथ्यों की और मनगढंत होती थी, जिससे सरकार को प्रेशर में लाकर विज्ञापन और दूसरी सुविधाएं हासिल की जा सके, लेकिन वहां की सरकारें पत्रिका से नहीं डरी, बल्कि मनगढंत व बिना तथ्यों की खबरों पर एक्शन लेते हुए मानहानि केस करके सरकारों ने भी राजस्थान पत्रिका के मालिकों को अपनी ताकत का अहसास कराया और छत्तीसगढ़ और इस बार राजस्थान में भी सरकारी विज्ञापन बंद कर दिए। छत्तीसगढ़ में तो विधानसभा में भी पत्रिका के संवाददाताओं की एंट्री बैन कर दी थी।

करोड़ों का होने लगा नुकसान
इसके बाद भी राजस्थान पत्रिका ने लगातार सरकारों की कार्यशैली पर सवाल उठाने बंद नहीं किए। हर राज्य की जनता और विपक्ष ने राजस्थान पत्रिका के इन प्रयासों की जमकर सराहना की, लेकिन ये लोग पत्रिका प्रबंधन के छिपे एजेंडे को समझ नहीं पाए। कुछ साल तो इन्होंने सरकारों से जमकर लड़ाई लड़ी। लेकिन, यह कहावत है कि समाचार-पत्र मालिकों को सरकार से कुछ आशीर्वाद ना मिले तो बेचैनी शुरू हो जाती है। समय के साथ ऐसी ही बेचैनी राजस्थान पत्रिका मालिकों को भी होने लगी। सर्कुलेशन तो बढिय़ा हो गया, लेकिन विज्ञापन नहीं मिलने और सरकार का साथ नहीं होने से अखबार घाटे में चलने लगा। सरकारी विज्ञापन बंद होने से उन्हें हर माह करोड़ों रुपए का नुकसान होने लगा।
वारंट निकलते ही भाग गए सम्पादक
सूत्रों का कहना है कि छत्तीसगढ़ की रमन सरकार ने तो राजस्थान पत्रिका के सम्पादकों के खिलाफ वारंट भी निकलवा दिए थे। गिरफ्तार करने के लिए छत्तीसगढ़ से पुलिस राजस्थान स्थित पत्रिका कार्यालय में आ गई। उस समय सारे सम्पादक ऑफिस से गायब हो गए।

जिन्हें बता रहे थे धृतराष्ट्र, अब उनके ही लगा रहे धोक

राजस्थान में तो विज्ञापन बंद होने से माननीय और खुद को पत्रकारिता का पुरोधा कहलाने वाले गुलाब कोठारी के हृदय पर कैसा आद्यात हुआ, यह सब तो आप उनके कुछ दिनों पहले छपे सम्पादकीय में पढ़ ही चुके हो। इस संपादकीय में इन्होंने यह तक कह दिया था कि सामान बेचकर भी अखबार को सरकार के बचे कार्यकाल में भी निकाल लेंगे, लेकिन भ्रष्ट सरकारों व मुख्यमंत्रियों के सामने नहीं झुकेंगे। लेकिन लगता है अब गुलाब कोठारी को आटे-दाल का भाव मालूम चलने लगा है। जिन्हें वे भ्रष्ट सरकार बता रहे थे और धृतराष्ट्रÓ और दुर्योधन की संज्ञा देते नहीं थकते थे। अब उनसे ही सुलह के लिए माननीय गुलाब कोठारी धोक देने में लगे हुए हैं।
राजस्थान सरकार ने विवादित सुखम् गार्डन मामले में घेरते हुए उनके मालिकाना कागजात मांग रखे हैं। दूसरी विवादित सम्पत्तियों और मामलों पर भी सरकार ने पैनी नजर रखी हुई है। घिरते देख अब सेठजी अचानक भीगी बिल्ली बन गए। सूत्रों का कहना है कि उन्होंने सरकार से सुलह की भी कोशिश की थी, लेकिन बात नहीं बनी। इसके बाद उन्होंने सरकारी विज्ञापन बंद होने के मामले को सुप्रीम कोर्ट में उठाया और विज्ञापन शुरू करवा लिए, लेकिन सरकार अब भी विज्ञापन नहीं दे रही है। इससे यह अंदाजा तो हर किसी को हो गया कि मीडिया मालिक बिना सरकारी कृपा के कुछ भी नहीं कर सकते हैं।

अब उनके स्वागत में बिछ रहे कालीन

अब छत्तीसगढ़ का मामला देखिए। पहले माननीय गुलाब कोठारी ने पत्रिका की-नोट कार्यक्रम में छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह को बुलाया। 30 सितम्बर,16 को जयपुर स्थित पत्रिका मुख्यालय में उनके सांसद बेटे अभिषेक सिंह का छह कॉलम में साक्षात्कार प्रकाशित करके मुख्यमंत्री और उनके सांसद पुत्र की मिसाजपुर्सी की है। कल तक इन्हें भ्रष्ट बताते नहीं थकते थे, आज उनके स्वागत में कालीन बिछा रहे हैं। सूत्रों का कहना है कि मध्यप्रदेश सरकार से भी अब धीरे-धीरे इनकी गाड़ी पटरी पर तो आ रही है, लेकिन इन्हें वो तवज्जों नहीं दी जा रही है, जो वहां के दूसरे अखबारों और उनके मालिकों को मिल रही है।

सोश्यल मीडिया खोल रहा पत्रकारिता की पोल

हमारा कहने का उद्देश्य यह है कि मीडिया भले ही स्वयं को लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ मानता
हो और यह समझता हो कि वो जो छापेगा, जनता उसे सच मानेगी। कुछ साल पहले तक यह जरूर संभव था, लेकिन अब इस सोश्यल मीडिया के युग में अखबार मालिकों की विज्ञापनों और सुविधाओं के लिए ब्लैकमेलिंग वाली पत्रकारिता की पोल सामने आने लगी हैं। सरकारें भी सोश्यल मीडिया का इस्तेमाल करके ऐसे अखबार मालिकों की काली करतूतों को सामने लाने से नहीं चूकती हैं। सरकारी विज्ञापनों और सुविधाओं के लिए पत्रिका प्रबंधन का दोगलापन बखूबी सामने आ रहा है। जनता भी इसे खूब समझ रही है।