पत्रिका जयपुर सम्पादक विज्ञापन के नाम कर रहे वसूली!

जयपुर। लगता है राजस्थान पत्रिका में सम्पादकों के लिए कोई कार्य नहीं बचा है। शायद इसलिए पत्रिका प्रबंधन ने उन्हें खबरों के बजाय विज्ञापन के कार्य में लगा दिया है। आखिर पत्रिका प्रबंधन को भी पता चल गया है कि सारे सम्पादकों के पास ऑफिस में बिजली फूंकने और कुर्सी तोडऩे के अलावा कोई कार्य नहीं है। इसलिए पत्रिका प्रबंधन ने अपने सभी स्थानीय सम्पादकों को दीपावली के विज्ञापन बुक करने के कार्य में लगा दिया है।

एक अंशकालिक संवाददाता को 10 पेज का टारगेट

सूत्रों का कहना है कि जयपुर के स्थानीय सम्पादक अमित वाजपेयी इन दिनों ग्रामीण इलाकों का दौरा कर रहे हैं और अंशकालिक संवाददाताओं के ऊपर विज्ञापन देने का दबाव बना रहे हैं। कई पीडि़त अंशकालिक संवाददाताओं ने मीडिया होल्स को बताया कि सम्पादक ने उनको कहा कि कम से कम 10 फुल पेज विज्ञापन बुक करो। ऐसा नहीं करने पर अंशकालिक संवाददाता को बदलने की नसीहतनुमा धमकी भी दे डाली।

पिछली दीपावली के ही नहीं आए पैसे

इन संवाददाताओं का कहना है कि मजबूरी में हमने हां तो कर ली है, लेकिन अब विज्ञापन कैसे करेंगे, इसकी चिंता हो रही है। इनका कहना है कि पत्रिका तो विज्ञापन प्रकाशित होते ही हमसे पैसे ले लेता है, लेकिन हमें विज्ञापनदाता टुकड़ों में और धीरे-धीरे पैसे देता है। कई बार तो विज्ञापन की राशि डूब भी जाती है। क्योंकि, टारगेट पूरा करने के चक्कर में हमें जबरदस्ती भी किसी का विज्ञापनलगाना पड़ता है। ऐसे में जब इन लोगों से पैसा मांगने जाते हैं तो वे कहते हैं कि हमने तो विज्ञापन लगाने के लिए कहा ही नहीं था। इनका कहना है कि पिछली दीपावली पर भी इसी तरह का टारगेट मिला था। अभी तक तो उन्हीं विज्ञापनदाताओं ने पैसे नहीं दिए। हम अपनी जेब से कब तक विज्ञापन देते रहे।

ब्यूरो चीफ ने अपना टारगेट भी डाला अंशकालिक के ऊपर

सूत्रों का कहना है कि जिन ग्रामीण इलाकों में पत्रिका के ब्यूरो कार्यरत हैं, उनके ब्यूरो चीफ को भी विज्ञापन बुक करने का फरमान सुनाया हुआ है। ऐसे में इन ब्यूरो चीफ ने भी खुद के पेटे के विज्ञापन बुक करने का दबाव अंशकालिक संवाददाताओं पर बना दिया है। ऐसे में अंशकालिक संवाददाता परेशान हैं कि सम्पादक की ओर से दिया गया टारगेट तो पूरा हो नहीं रहा, ब्यूरो चीफ का अलग से कैसे करेंगे। जबकि ब्यूरो चीफ को तो पत्रिका हर माह मोटी सैलेरी देती है। इसलिए विज्ञापन तो उसी से ही बुक कराने चाहिए। हम अंशकालिक संवाददाताओं पर यह बोझ क्यों डाला जा रहा है।

पिछली दीपावली पर भी हुआ ऐसा, नप गए तत्कालीन इन्चार्ज

सूत्रों का कहना है कि पिछली दीपावली पर भी तत्कालीन पत्रिका ग्रामीण इन्चार्ज ने अंशकालिक संवाददाताओं पर विज्ञापन बुक करने का दबाव बनाया था। वे तत्कालीन इन्चार्ज स्वयं के स्तर पर विज्ञापन बुक करके पत्रिका प्रबंधन की आंखों का तारा बनने की फिराक में थे। उस दौरान विज्ञापन बुक करने को लेकर उनकी विज्ञापन विभाग के अधिकारियों से भी नोक-झोंक हुई थी। उनकी ऊपर तक भी शिकायत गई थी, लेकिन तब पत्रिका प्रबंधन ने कोई कार्यवाही नहीं की थी। इससे उन इन्चार्ज के हौसले बुलंद हो गए थे। उसके बाद उन्होंने अपने स्तर पर सर्कुलेशन बढ़ाने की ठानी और सभी अंशकालिक संवाददाताओं को राजस्थान पत्रिका की प्रतियां बढ़ाने को कहा। इस कारण उनकी सुर्कलेशन विभाग से ठन गई। सूत्रों का कहना है कि उन इन्चार्ज को सम्पादकीय विभाग का तो कोई कार्य आता नहीं था। ऐसा नहीं था कि उनमें अनुभव की कमी थी। करीब 20 साल का सम्पादकीय अनुभव उनमें कूट-कूटकर भरा था, लेकिन बस कार्य ही नहीं आता था। ना तो खबर लिखना आता था, ना ही पेज पर अशुद्धियां चैक करना। ना पेज बनाना आता था और ना ही बनवाना। खबरों के सम्पादन से तो उनका दूर-दूर तक का वास्ता नहीं था। हालांकि, किसी को चिट्ठी-पत्री लिखने, मेल करने में वो दक्ष थे। यानी एक बाबू में जो गुण होते हैं, वे सारे उनमें थे। अब आते हैं मुख्य मुद्दे पर। इसके बाद सर्कुलेशन विभाग ने भी खबरों में जा रही गलतियों को खोजना शुरू किया और उन इन्चार्ज को रोज गलतियों की मेल आने लगी। उनकी शिकायतें ऊपर तक होने लगी और प्रबंधन को ये मैसेज पहुंचा दिया गया कि इनको सम्पादकीय कार्य की समझ नहीं है। इसके बाद उनको वहां से हटाया गया। सूत्रों का कहना है कि पत्रिका प्रबंधन ने उन जनाब को अभी किसी फोटो वेबसाइट में फोटो डालने के कार्य में लगाया हुआ है।