नेशनल दुनिया प्रबंधन ने संपादक मनोज माथुर समेत सभी पत्रकारों व कर्मियों को निकाला

जयपुर। आखिरकार नेशनल दुनिया प्रबंधन ने अपने सभी पत्रकारों और कर्मचारियों को बाहर का रास्ता दिखाते हुए उन्हें नमस्ते कह दी है। हटाए गए स्टाफ में संपादक मनोज माथुर व उसकी वफादार टीम भी। इस टीम से प्रबंधन काफी गुस्से में था। यह टीम दो महीने से कार्यालय आ भी नहीं रही थी और दूसरे अखबारों में नौकरी के लिए भटक रही थी। हालांकि इनकी करतूतें और भ्रष्ट कारनामों को देखते हुए हर कोई बाहर से ही नमस्ते कर रहा है। प्रबंधन ने माथुर व उसकी वफादार टीम को अभी तक कोई हिसाब नहीं किया है, हालांकि दूसरे पत्रकारों व स्टाफ को वेतन दिए जाने की बात सामने आ रही है। बताया जा रहा है कि इन्हें एक महीने की सैलेरी दी है और शेष पांच महीने का वेतन चेक के हिसाब से दिया है। छह-सात महीने के बकाया वेतन को लेकर नेशनल दुनिया प्रबंधन और स्टाफ में ठनी हुई थी। पूरा वेतन देने को लेकर पत्रकार कई बाहर हडताल कर चुके थे। दो महीने से ज्यादा तनाव चल रहा था। स्टाफ ने साफ मना कर दिया था कि वे पूरा वेतन नहीं मिलने तक काम नहीं करेंगे। दो महीने से हडताल चल रही थी। ना वे काम कर रहे थे और ना ही दूसरे स्टाफ को काम करने दे रहे थे। हटाने के बाद संपादक मनोज माथुर, न्यूज एडिटर जनार्दन कुलश्रेष्ठ, संदीप माथुर, मदन कलाल समेत उन सभी पत्रकारों, डेस्ककर्मियों के साथ मार्केटिंग और सकुर्लेशन टीम को बाहर कर दिया है।

हटाने का पहले ही पता लग चुका था माथुर एंड टीम को

माथुर व उसकी टीम को हटाए जाने का पहले ही पता लग चुका था, लेकिन दूसरे स्टाफ को यह नहीं बताया। खुद तो दूसरे अखबारों में नौकरी तलाशते रहे, लेकिन अपने स्टाफ से यह तथ्य छुपाते रहे। हालांकि दो महीने भटकने के बाद भी किसी भी अखबार ने माथुर व उसकी टीम को नहीं लिया और बाहर से नमस्ते करते रहे। वैसे भी नेशनल दुनिया को डुबोने, भ्रष्टाचार फैलाने और प्रबंधन को काफी नुकसान पहुंचाने में मनोज माथुर, पहले ही हटाए गए जीएम मनीष अवस्थी और उनकी टीम का काफी योगदान रहा है। इस टीम के पूरे कारनामे मीडिया जगत में खूब चर्चा में रहे हैं। इस वजह से कोई भी इन पर हाथ धरने से बच रहा है।

नया स्टाफ होगा भर्ती

हालांकि इनकी टीम कुछ साथी बाजार में यह कहते फिर रहे हैं कि अभी नेशनल दुनिया ने हमें हटाया नहीं है, बल्कि वे वहीं काम कर रहे हैं और अखबार भी छप रहा है। जबकि सच्चाई उससे उलट है। दो महीने से अखबार पूरी तरह बंद पड़ा है। प्रबंधन ने अब नए सिरे से स्टाफ लेना शुरु कर दिया है। स्टाफ पूरा होने पर ही फिर से नए सिरे काम होगा। अखबार की साइज भी कम होगी और पृष्ठ संख्या भी।

माथुर ने की दगाबाजी

हडताल के दौरान पत्रकार व दूसरे स्टाफ की मनोज माथुर व उनकी टीम से कई बार झड़प भी हुई। वेतन नहीं मिलने पर स्टाफ ने संपादक मनोज माथुर को कहा तो उन्होंने मालिक शैलेन्द्र भदौरिया से बात नहीं की और ना ही यह बताया कि मालिक ने अखबार बंद करने की कह दी है। जब स्टाफ को पता चला तो वे सीधे तौर पर मालिक व उसके छोटे भाई से संवाद करने लगे। कई बार राजापार्क स्थित महाराणा प्रताप विश्वविद्लालय कार्यालय के बाहर प्रदर्शन किया। इस दौरान संपादक व उनकी टीम ने सहयोग नहीं किया, जबकि दूसरा स्टाफ इन्हीं के कहने पर पत्रिका, भास्कर जैसे बड़े अखबार छोडक़र आया था। मनोज माथुर यह कहता था कि जब काम ही नहीं कर रहे है तो वेतन किस बात का। जो मालिक कहता था, उसके सुर में सुर मिलाते हुए पुलिस केस करने की धमकी देने से नहीं चूकते थे। एक डेस्क साथी ने तो मनोज माथुर के दोगलेपन पर थप्पड भी जड़ दिया था। तब से वे कार्यालय में आने से भी डरने लगे। दूसरा स्टाफ भी गुस्से में कुछ भी बोलने लगता था।

प्रबंधन को बनाया बेवकूफ

नेशनल दुनिया प्रबंधन ने जिस संपादक मनोज माथुर व जीएम मनीष अवस्थी पर भरोसा किया, उन्होंने आपस में मिलीभगत करके अपने ही मालिक की पीठ पर छुरा घोंपा। प्रबंधन को हमेशा अंधेरे में रखते हुए सर्कुलेशन के सही तथ्यों को छिपाया और मालिकों को गलत जानकारी देते रहे कि काफी पसंद किया जा रहा है। जबकि अखबार ग्राहकों के बजाय कबाडिय़ों में बिकता नजर आया। भ्रष्ट लोगों की टीम बनाकर वसूली के धंधे में लग गए। पैसे लेकर खबरें छापना और दबाना शगल बन गया। विज्ञापनों में भी बड़ा घपला किया।

समाचार जगत पर डाल रहे हैं डोरे

मनोज माथुर व उसकी टीम समाचार जगत प्रबंधन को पटाने में लगी हुई। दो महीने में तीन-चार बार मीटिंग हो चुकी है, लेकिन उनके पुराने कारनामों को देखते हुए समाचार जगत के मालिक व उनके पुत्र उन पर विश्वास नहीं कर रहे हैं। वे मना भी कर चुके हैं, लेकिन कहीं ना कहीं अप्रोच लगाकर वहां पहुंचते रहते हैं। दो दिन पहले भी मनोज माथुर व उसके तीन वफादार साथी समाचार जगत पहुंचे थे, लेकिन अभी तक वहां से पक्का जवाब नहीं मिला है।