गुलाब कोठारी का झूठ पढ़िए... विज्ञापन के लिये पत्रकारिता का प्रलाप कर रहे....

श्रीगंगानगर। केंद्र और राज्य सरकार से विज्ञापन ना मिलने पर राजस्थान पत्रिका वाले श्रीमान गुलाब कोठारी जी ने लिखा, ''हम तो हमेशा की तरह अपने पाठकों के बूते अपना कुछ सामान बेचकर भी अगले ढाई साल गुजार देंगे।'' बहुत अच्छी बात। अपना सामान बेच बेच कर भी पत्रकारिता को जिंदा रखने वाला इस युग मेँ कोई विरला ही हो सकता है। उनके शब्द काफी क्रांतिकारी हैं। ऐसा कहना मिसाल है और करना बेमिसाल होगा। पत्रकारिता मेँ नए युग की शुरुआत होगी। ऐसे शब्द और जज्बा किसी योगी और फकीर के पास ही होता है। उनके शब्दों को पढ़ मुझे भी हौसला हुआ। मानसिक रूप से उनके चरणों को प्रणाम किया और उनकी सोच को अभिनंदन। शब्दों से प्रेरित हो तय किया कि अपना कुछ ना कुछ बेच कर बंद किया अखबार फिर शुरू करूंगा। मैं तो अभी इसकी तैयारी ही कर रहा था कि क्रांतिकारी शब्दों के रचयिता के अखबार मेँ प्रलाप दिखा।
प्रलाप अर्थात रुदन। विज्ञापन ना मिलने का प्रलाप। सरकारों की कृपा ना बरसने का प्रलाप। समझ नहीं आया कि ऐसे ज्ञानी, ध्यानी, धार्मिक, आध्यात्मिक, स्थितप्रज्ञ व्यक्ति के अखबार मेँ ऐसा प्रलाप! वेद, उपनिषद, बड़े बड़े शास्त्रों, ग्रन्थों पर टीका लिखने वालों के अखबार मेँ किसी की दया ना मिलने पर ऐसा प्रलाप! पाठकों को मोह, माया, लोभ, क्रोध आदि विकारों से दूर करने के प्रवचन कर मोक्ष के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देने वालों के अखबार मेँ सरकारी विज्ञापनों के लिये ऐसी हाय तौबा। इतनी पीड़ा। दिमाग भन्ना गया। विश्वास ही नहीं हुआ। ऐसा कैसे हो सकता है!
हर हाल मेँ सम रहने के उपदेश देने वाले इत्ती से बात पर रोना पीटना कैसे कर सकते हैं! परंतु लिखे शब्द तो इतिहास बन जाते हैं। शब्द भी उसमें थे, जो कभी झूठा लिखता ही नहीं। एक एक शब्द सच्चा। मतलब वह प्रलाप ही था। पहले तो सामान बेच कर बंद अखबार को शुरू करने का विचार त्यागा। फिर उधर भागा, जिधर पिछले सप्ताह के अखबार रखे थे। भागा इसलिये कि कहीं बीवी ने बेच ना दिये हों। मिल गए। देखा, पढ़ा। इस मुद्दे पर बड़े बड़े नेताओं से उनके विचार पूछ कर प्रकाशित किये जा रहे हैं। जिस से पूछोगे वह निश्चित रूप से हां मेँ हां ही मिलाएगा। यही कहेगा, यह संविधान प्रदत अधिकारों का हनन है, विज्ञापन बंद करना दुर्भाग्यपूर्ण है। कोई निंदा करेगा। कोई इसके लिये आवाज उठाने का वादा करेगा। कोई ये क्यों कहेगा कि विज्ञापन नहीं मिले तो ठीक हुआ, सरकारी धन बचा। परंतु सवाल ये कि पत्रकारिता क्या केवल सरकारी विज्ञापन पर आधारित है?
विज्ञापन नहीं मिले तो पत्रकारिता का दी एंड। विभिन्न क्षेत्रों मेँ अपना रुतबा, गौरव, सम्मान स्थापित करने वाला आज सरकारी सहायता के इतने मोहताज हो गए कि विज्ञापन बंद हुए तो प्रलाप करने लगे! पत्रकारिता की उतनी समझ तो नहीं जितनी उनको है, लेकिन इतना तो एक साधारण से साधारण पत्रकार भी समझ जाएगा कि विज्ञापन के लिये रोज रोज प्रलाप करना तो पत्रकारिता नहीं हो सकती। यह पत्रकारिता की धार को कुन्द करने वाला है। पत्रकारिता के तेज को कम करेगा। अखबार और उसके मालिक, दोनों की चमक फीकी पड़ जाएगी। आभा कम होगी। पत्रकारिता मेँ दम है तो करो सरकारों के काम काज मेँ रही कमियों का भंडा फोड़। टिकाओ उनके घुटने। करो उनको मजबूर नीति बदलने को। किन्तु इधर तो उलटा हो रहा है।
पत्रकारिता के घुटने टिके हुए नजर आ रहे हैं। घुटने टेक के विज्ञापन ले भी लिये तो कौनसी उपलब्धि होग! पता नहीं बड़े बड़ों की ये कैसी पत्रकारिता है। इतना प्रलाप तो गंगानगर से प्रकाशित अखबारों के मालिक नहीं करते, जितना ये कर रहे हैं। विज्ञापन तो कभी ना कभी शुरू हो ही जाएंगे, परंतु क्या तब भी इनकी पत्रकारिता के तेवर यही रहेंगे! संभव नहीं। किसी की दया लेने पर नजर झुकती ही है। हमारे जैसा कोई कर भी क्या सकता है। बड़ों की बड़ी बात। समर्थ को दोष नहीं।

शायर मजबूर की लाइनें पढ़ो-
कहना है इतना कुछ कह नहीं सकते
फितरत है अपनी चुप रह नहीं सकते
झूठ पे लानत हर कोई फेंके
सच कहते हैं सच सह नहीं सकते।

लेखक गोविंद गोयल श्रीगंगानगर (राजस्थान) के वरिष्ठ पत्रकार हैं।