एक्सक्लूसिव... ये चोर-चोर-चोर मचाए शोर

लेशिष जैन
जयपुर। हिन्दी फिल्म थ्री इडियट्स ना केवल बॉक्स ऑफिस पर पहली 100 करोड़ कमाने वाली मूवी थी बल्कि यह एक अच्छी सीख भी देकर गई। सीख ऐसी कि इनसान अपनी काबिलियत को पहचानकर उस क्षेत्र में अपना मुकाम हासिल करें। हमारा यहां मकसद इसकी स्क्रिप्ट याद दिलाना नहीं है बल्कि राजस्थान पत्रिका में इस तरह से चल रही गड़बड़ियों को उजागर करना है। पत्रिका में कार्य कोई और करता है, लेकिन अधिकारियों की चापलूसी करने वाले कुछ लोग उस कार्य का क्रेडिट खुद ले जाते हैं। असली मुद्दे पर आने से पहले क्यों ना इस फिल्म के किरदारों के रोल की भी चर्चा हो जाए।
थ्री इडियट्स में आमिर खान की छवि इंजीनियरिंग क्षेत्र में महारत हासिल वाली बताई गई है। इसलिए मेहनत करके इंजीनियरिंग में अव्वल वह आता है और उसकी डिग्री का इस्तेमाल रणछोड़दास यानी जावेद जाफरी करता है। वहीं इसमें एक अन्य हीरो आर.माधवन भी है, जिसका शौक तो वाइल्ड लाइफ फोटोग्राफी होता है, लेकिन पिता के डर से इंजीनियरिग करने को मजबूर है। हालांकि, अंत में आमिर खान की नसीहत पर चलकर वह वाइल्ड लाइफ में कॅरियर बनाता है और सफलता हासिल करता है।

बिना कुछ किए ले रहे क्रेडिट

अब सुनिए असल मुद्दा। राजस्थान पत्रिका में भी ऐसे कई आमिर खान हैं, जो मेहनत करते हैं, लेकिन रणछोड़दास जैसे लोग उनका क्रेडिट ले जाते हैं, वहीं आर.माधवन जैसे कई नमूने भी हैं जिनको सम्पादकीय कार्य की रत्तीभर भी समझ नहीं हैं, लेकिन बिना कुछ किए भी पत्रकारिता में अवॉर्ड हासिल कर रहे हैं। यह अवॉर्ड आमिर खान जैसे साथियों की मेहनत के हैं, जिन्हें चापलूसी कर रणछोड़दास जैसे कर्मचारी अपनी झोली में डलवा रहे हैं।
सूत्रों का कहना है कि पत्रिका ने 8 नवम्बर 2016 के अंक में ' ऐसे कैसे फैलेगा ज्ञान का उजाला अभियान को आईबीआर का सम्मान' नामक खबर प्रकाशित की थी। इस खबर में एक महाशय के हवाले से इस अभियान के बारे में बताया गया है। यानी इस खबर को पढ़कर सभी को यह समझ में आ रहा है कि यह अभियान इन्हीं महाशय की मेहनत का नतीजा है। लेकिन, सच्चाई इससे कोसों दूर हैं। इस अभियान से इनका दूर-दूर तक का कोई वास्ता नहीं है। इस अभियान का क्या नाम होगा, लोगो डिजाइन कैसा होगा, इस अभियान की सूचना समाचार-पत्र में कैसे जाएगी, अभियान शुरू करते समय इसका एंगल क्या होगा, खबरें कैसे सम्पादित होंगी यानी अभियान से सम्बंधित सारी परिकल्पनाओं में इन महाशय का रत्तीभर भी योगदान नहीं है। यह सारा कार्य किया था लेशिष जैन ने। लेशिष जैन उस समय जयपुर डाक में बतौर डेस्क इंचार्ज थे और ये महाशय इंचार्ज। जयपुर डाक के अन्य साथी भी इस बात को अच्छे से जानते हैं कि अभियान का सारा कार्य लेशिष जैन ने खुद किया। कई दिनों तक अकेले ही सभी पुलआउट के लिए इसकी खबरें भी सम्पादित की। हालांकि, बाद में डेस्क के अन्य साथियों को उनके पुल आउट के हिसाब से खबरें सम्पादित करने को दी गईं। लेकिन, ये महाशय तो इस रोल में कहीं नहीं थे। उस समय सिर्फ डमी इंचार्ज के रूप में मशहूर इन महाशय के हिस्से का सारा कार्य लेशिष जैन करते थे। उस समय के डाक संस्करणों की तारीफ लेशिष जैन के आलोचकों ने भी की थी। चूंकि, लेशिष जैन मजीठिया के हक को लेकर सुप्रीम कोर्ट पहुंच गए और प्रबंधन ने उनका तबादला कोलकाता कर दिया। इसलिए लेशिष जैन के कार्य का क्रेडिट ये महाशय रणछोड़दास बनकर ले गए।

...तो हो जाते क्रेडिट देने लायक

अब इन महाशय को ये कौन समझाए कि बाबूगीरी के काम में इनका कोई दूसरा सानी नहीं है, इसलिए यह कार्य करते तो अपनी मेहनत से सफलता का स्वाद चखते। लेकिन, पता नहीं ये महाशय भी आर.माधवन की तरह किसके डर की वजह से पत्रकारिता के क्षेत्र में आ गए। अब भी समय है कि ये महाशय अपनी काबिलियत पहचानें और उसमें अपना कॅरियर बनाएं। यही कारण है कि 20 साल का कॅरियर होने के बाद भी साथियों के हक का क्रेडिट खुद ही ले रहे हैं। इतने साल के कॅरियर में तो लोग क्रेडिट देने लायक हो जाते हैं।
अब ये महाशय अपनी सफाई में कहेंगे कि क्रेडिट तो सम्पादक का ही होता है, तो फिर क्रेडिट डिप्टी एडिटर श्री भुवनेश जैन या फिर उस समय के जयपुर सम्पादक श्री राजीव तिवारी को जाना चाहिए। ऐसा नहीं हुआ तो फिर पूरी टीम को क्रेडिट मिलना चाहिए। लेकिन उस पूरी टीम के योगदान को पत्रिका प्रबंधन ने भुलाकर उनके मन में अपने लिए कड़वाहट ही पैदा की है।

इन अभियानों की भी हो बारीकी से जांच

सूत्रों से पता चला है कि इन महाशय को पत्रिका प्रबंधन ने रोड सेफ्टी सहित कई अभियानों के लिए पंडित झाबरमल्ल पुरस्कार भी दिया है। हालांकि, इसमें इनका वाकई कितना योगदान है, यह भी पता करने की जरूरत है। यदि पता किया जाए तो मालूम चलेगा कि इसमें भी किसी और की मेहनत थी, जिसका क्रेडिट ये महाशय यहां भी रणछोड़दास बनकर ले गए। होना तो यह चाहिए था कि पत्रिका प्रबंधन यह पुरस्कार टीम वर्क को देती। क्योंकि, उस टीम के कार्य को तो प्रबंधन ने नजरअंदाज ही कर दिया, जिसकी वजह से ये अभियान सफल हुए। सूत्रों का कहना है कि पहले झाबरमल्ल पुरस्कार में इनका नाम नहीं था, लेकिन अधिकारियों के हाथ जोड़ कर अंतिम समय में अपना नाम शामिल करवा लिया।

पहले भी लग चुके हैं आरोप

सूत्रों का कहना है कि इन महाशय पर दूसरों की खबरों पर खुद का क्रेडिट लेने के आरोप पहले भी लग चुके हैं। यदि इतिहास फिर से खंगाला जाए तो पता चलेगा कि जब ये महाशय स्पेशल टीम के इंचार्ज थे, तब इनके साथ कार्य करने वाले रणजीत सिंह चारण ने बाड़मेर रिफाइनरी के घोटाले वाली खबर लिखी थी। चूंकि, उस समय बाड़मेर रिफाइनरी का मामला राज्य में सुर्खियों में था और रणजीत ने अपने दम पर साक्ष्य जुटाकर उसकी एक्सक्लूसिव खबर लिखी थीं। लेकिन, इन महाशय ने अपनी चापलूसी का ऐसा मंतर अधिकारियों पर फेरा कि अधिकारियों ने रणजीत की खबर में इनका नाम पहले शामिल करने का हुक्म जारी कर दिया। रणजीत ने अधिकारियों को इसके बारे में बताया भी, लेकिन किसी ने उसकी नहीं सुनी।

महाशय मंझे हुए रणछोड़दास

सूत्रों का कहना है कि वास्तविकता में यह खबर लिखी रणजीत सिंह चारण ने और सम्पादित की डेस्क कर्मी प्रतीत चटर्जी ने। यानी इस खबर के भी किसी कार्य में इन महाशय का कोई योगदान नहीं था, फिर भी इन्होंने खबर में अपना क्रेडिट ले लिया। रणजीत और प्रतीत फिलहाल दैनिक भास्कर में कार्यरत हैं। यानी इससे साफ होता है कि ये महाशय मंझे हुए रणछोड़दास हैं।

इन महाशय के मित्र भी हैं मंझे हुए रणछोड़दास

रणछोड़दास जैसी कला के ज्ञानी इन महाशय ने अपनी इस कला को अपने तक ही सीमित नहीं रखा है। पत्रिका में अपने कई मित्रों को भी इन्होंने इस कला में पारंगत कर रखा है। बड़े लोगों का भी कहना है कि ज्ञान बांटने से और बढ़ता है। सूत्रों का कहना है कि जब ये महाशय जयपुर ग्रामीण के डमी इंचार्ज थे, तब वहां इनके एक बैचमेट भी कार्यरत थे। उन बैचमेट के ज्ञान का तो क्या कहना। इन महाशय ने अपने उस बैचमेट को खबर लिखने को प्रोत्साहित किया। अब उन बेचारे बैचमेट ने कभी अपने से खबर लिखी हो तो खबर का मसाला तैयार करते। लेकिन, चेले तो गुरू से भी एक कदम आगे निकले। उन्होंने खबर ऐसी बनाई कि किसी अंशकालिक संवाददाता के नाम को हटाकर अपने नाम से ही खबर चलवाई। अब बेचारा अंशकालिक संवाददाता क्या कहता, उसे नौकरी जो करनी थी। इस खबर के घपले की जानकारी किसी तरह तत्कालीन डेस्क इंचार्ज लेशिष जैन को मिली और उन्होंने चोर-चोर मौसेरे भाई के इस कारनामे पर तुरन्त रोक लगवाई।