कोयम्बटूर में पत्रिका की हालत...आमदनी अठन्नी और खर्चा रूपैया

कोयम्बटूर। पत्रिका प्रबंधन प्रतिस्पर्धा के चलते भले ही नए राज्यों में ऑफिस खोल रहा हो और अपनी पीठ खुद ही थपथपा रहा हो। लेकिन, हकीकत में वह अपनी जमीन इन राज्यों में अभी तक तलाश नहीं पाया है। या यूं कहें कि इन राज्यों में पत्रिका की स्थिति आमदनी अठन्नी और खर्चा रूपैया वाली है। पत्रिका कुछ ऐसी ही हालत से दो-चार हो रहा है कोयम्बटूर में। सूत्रों का कहना है कि कोयम्बटूर में रहने वाले राजस्थानी परिवारों में से कुछ परिवार ही पत्रिका को पढ़ते हैं। बाकी अखबार रद्दी में काम आ रहा है। इसकी लोकप्रियता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि पूरे नवम्बर माह में सिर्फ 55 हजार रूपए का विज्ञापन आया। जबकि पूरे स्टाफ की सैलेरी, ऑफिस किराया, बिजली, पानी, सफाई, चाय-पानी पर खर्चा करीब पांच लाख प्रतिमाह है। सूत्रों का कहना है कि इस खर्च के अलावा अखबार छापने का खर्च अलग है। कोयम्बटूर में मैनेजर की जिम्मेदारी भी सम्पादक पर ही है। यानी विज्ञापन की जिम्मेदारी भी सम्पादक की ही है। लेकिन, वे तो छुट्टियां मना रहे हैं।

कुल सर्कुलेषन 4500, 1500 बच जाती है

सूत्रों का कहना है कि पत्रिका कोयम्बटूर का सर्कुलेशन करीब 4500 है। इनमें से करीब 1500 कॉपी वापस आ जाती हैं। यानी पूरे पत्रिका कोयम्बटूर एडिशन का सर्कुलेशन 3000 कॉपियों का ही है।

आमदनी 250, लागत 500 रूपया

सूत्रों का कहना है कि कोयम्बटूर से ही अखबार केरल सहित अन्य जगह भी जाता है, जहां सर्कुलेशन सिर्फ 40-50 कॉपियां ही हैं। यानी 200-250 रूपए का अखबार। लेकिन, वहां इन्हें भेजने का खर्च ही करीब 500 रूपए आता है। यानी लागत से ज्यादा खर्च। इन आंकड़ों से साफ है कि पत्रिका नई जगह अभी तक अपनी जमीन तलाश नहीं पाया है। भले ही जयपुर में बैठे उसके सर्कुलेशन विभाग के हैड आंकड़ों के जरिए बढ़ा-चढ़ाकर सर्कुलेशन बताकर मालिकों की आंखों पर हरे रंग का चश्मा लगा रहे हों, लेकिन हकीकत बहुत कड़वी है। पत्रिका को ना तो पाठक मिल पा रहे हैं और ना ही विज्ञापनदाता। यानी आमदनी अठन्नी और खर्चा रूपैया।