सहायक श्रम आयुक्त को दिए झूठे जवाब में खुद ही फंसा पत्रिका प्रबंधन

छत्तीसगढ़। राजस्थान पत्रिका के बिलासपुर संस्करण के कम्प्यूटर विभाग में कार्यरत एक साथी को प्रबंधन ने मजीठिया वेज बोर्ड का लाभ नहीं दिया है। जब उन्होंने इस बारे में श्रम आयुक्त के पास शिकायत की है, तभी से पत्रिका प्रबंधन लगातार उनको परेशान कर रहा है। लेकिन, वे पत्रिका प्रबंधन के आगे नहीं झुके और शिकायत वापस नहीं ली। उन्होंने अपने कुछ साथियों के साथ श्रम आयुक्त के पास स्टेटमेंट ऑफ क्लेम भी लगा दिया। इसके बाद तो पत्रिका प्रबंधन की हवाइयां उड़ी हुईं थी। उनको और उनके साथियों से समझाइश की, नौकरी जाने का भय दिखाया और फिर सैलेरी बढ़ाने की बात कही, लेकिन उन्होंने पत्रिका प्रबंधन की एक नहीं मानी। इस पर पत्रिका प्रबंधन ने अपनी दूसरी चाल आजमाई, जिसे वह अपने सारे संस्करणों में आजमा रहा है। उसने श्रम आयुक्त के पास उन साथी के स्टेटमेंट क्लेम का जो जवाब दिया है, वह झूठ का पुलिंदा है। उस झूठ के पुलिंदे में जो बातें राजस्थान पत्रिका प्रबंधन ने कही है, उनमें वह भी फंसता दिख रहा है। हम आपका ध्यान भी उन झूठ की ओर आकर्षित करना चाहते हैं। खास बात यह है कि पत्रिका प्रबंधन ने पूरे जवाब में खुद को एक अनावेदक संस्थान बताया हुआ है। पूरी खबर पढि़ए...

तो बताओ ऑफिसर का प्रूफ

पत्रिका प्रबंधन ने श्रम आयुक्त को दिए जवाब में लिखा है कि फलां कर्मचारी कम्प्यूटर विभाग में बतौर ऑफिसर पी.एस.एस के पद पर कार्यरत है। उन्हें अनावेदक संस्थान में कई प्रबंधकीय और सुपरवाइजरी शक्तियां प्राप्त हैं। आवेदक के अधीन कई कर्मचारी कार्यरत हैं। यदि आवेदक के अधीन कई कर्मचारी हैं तो उसने उनकी कभी छुट्टी के आवेदक पर हस्ताक्षर किए होंगे, कभी उनकी वेतन वृद्धि की भी अनुशंसा की होगी, कभी किसी कर्मचारी को नोटिस भी दिया होगा। इन सभी के प्रूफ अनावेदक संस्थान ने श्रम आयुक्त को क्यों नहीं दिए। सिर्फ झूठ लिखकर दे दिया।

पोस्ट प्रबंधक और सैलेरी सिर्फ 9400 रुपए प्रतिमाह

उसके बाद जवाब में लिखा हुआ है कि आवेदक गैर श्रमजीवी पत्रकार की परिभाषा में शुमार नहीं है। इसलिए इन पर मजीठिया वेज वोर्ड की अनुशंसा लागू नहीं होती है। फिर लिखा हुआ है कि आवेदक को वर्ष 2011 में 9400 रुपए सैलेरी दी जा रही थी। मजीठिया वेज बोर्ड के अनुसार इनकी सैलेरी घटकर 7409 रुपए बन रही थी। इसलिए आवेदक ने 20 जे पर निर्धारित समयावधि में अंडरटेकिंग दे दी। अब आप सोचिए...यदि आवेदक मजीठिया का हकदारी नहीं है तो फिर आपने 20 जे पर अंडरटेकिंग क्यों ली। दूसरा यदि आवेदक को सुपरवाइजरी और प्रबंधकीय शक्तियां प्राप्त थीं तो उसका वेतन क्या 9400 रुपए होना चाहिए। क्या दूसरे विभागों के प्रबन्धकों को भी 9400 रुपए मिलते हैं। यदि हां, तो उनका ब्योरा अनावेदक संस्थान दे।

मजीठिया फॉर्मूले को बताए अनावेदक संस्थान

दूसरा अनावेदक संस्थान ने मजीठिया वेज बोर्ड की गणित कौनसे फॉर्मूले से लगाई है, जिससे सिर्फ 9400 रुपए सैलेरी पाने वाले व्यक्ति की सैलेरी घटकर 7409 रुपए बन रही है। उस फॉर्मूले के पूरे गणित का ब्योरा अनावेदक संस्थान दे। अनावेदक संस्थान की ओर से उन साथी को जो नियुक्ति पत्र मिला हुआ है, उसमें साफ लिखा है कि राजस्थान पत्रिका में आपको कम्प्यूटर विभाग में नियुक्त किया जा रहा है। उसमें कहीं नहीं लिखा कि आपको पी.एस.एस ऑफिसर पद पर नियुक्त किया जा रहा है।

कहां है ऑफिसर पद का पदोन्नति पत्र

यदि पत्रिका ने इनका आगे पी.एस.एस ऑफिसर पद पर प्रमोशन भी किया है तो वह पदोन्नति पत्र आवेदक के पास क्यों नहीं है। जवाब में यह भी लिखा है कि आवेदक ने जो क्लेम चार्ट प्रस्तुत किया है, वह गलत है। अगर वह गलत है तो अनावेदक संस्थान सही चार्ट श्रम आयुक्त को उपलब्ध कराए। इन सब बातों से साफ है कि राजस्थान पत्रिका प्रबंधन सिवाय झूठ के कुछ नहीं बोल रही है। लेकिन, एक दिन उसकी सारी झूठ हवा हो जाएंगी और कर्मचारी को ब्याज सहित पूरा पैसा देना पड़ेगा।

पत्रिका प्रबंधन पर कराओ 420 का केस दर्ज

उन साथी ने पत्रिका प्रबंधन की इस जालसाजी को मीडिया होल्स से शेयर किया और आगे के कदम पर राय मांगी है। मीडिया होल्स का कहना है कि पहले आप पत्रिका के जवाब की कॉपी लेकर सम्बंधित पुलिस थाने में जाएं और प्रबंधन के खिलाफ 420 का केस दर्ज कराएं। एफआईआर में साफ लिखें कि पत्रिका प्रबंधन ने श्रम आयुक्त को जो जवाब दिया है, वह झूठ का पुलिंदा है। उसने जो जवाब दिया है, उसके साक्ष्य मुझे उपलब्ध कराएं जाएं। यदि ऐसा नहीं हो पाता है तो संस्थान के खिलाफ 420 में कार्रवाई की जाए। सूचना के अधिकार के तहत एक ऐसा आवेदन श्रम आयुक्त के पास लगाएं। उसमें भी यही पूछें कि पत्रिका ने जो जवाब दिया है, उसके साक्ष्य उपलब्ध कराएं जाएं। मेरे अधीन कितने और कौन-कौन से कर्मचारी थे। मैंने कब-कब और किस-किस कर्मचारी को छुट्टी दी। उन आवेदनों की फोटो कॉपी। कितने कर्मचारियों की कब-कब वेतन वृद्धि की अनुशंसा की, उन सभी का रिकॉर्ड। कब किस कर्मचारी को नोटिस दिया, उसका भी रिकॉर्ड। इस तरह पत्रिका ने जो जवाब में लिखा है, उन सभी के साक्ष्य श्रम आयुक्त के जरिए मांग लो।