... तो नहीं लगता पत्रिका के मालिकों पर अवमानना का केस

भोपाल। यदि पत्रिका के मालिक जरा सा भी मन्थन करते तो आज उन्हें इस देश के सर्वोच्च न्यायालय में 7 अवमानना के केसों का सामना नहीं करना पड़ता और पत्रिका अखबार की ये दुर्गति नहीं होती जो इन 7 केसों में शामिल याचिकाकर्ताओं को टर्मिनेट और ट्रान्सफर करने के कारण हुई। पत्रिका के मालिक अपने ऊपर लगे पहले अवमानना के केस ( कंटेम्प्ट पिटीशन सिविल नम्बर 572/2014) के कारणों की जांच करता तो उन्हें यह मालूम चल जाता कि ये पहला केस जो कि पत्रिका भोपाल के संपादकीय विभाग के कर्मचारियों द्वारा लगाया गया था, वह भोपाल सम्पादकीय के तत्कालीन प्रभारी उरुक्रम शर्मा और मध्यप्रदेश के स्टेटहेड अरुण चौहान द्वारा संपादकीय विभाग के कुछ कर्मचारियों पर की गई दादागिरी का परिणाम था। गौरतलब है कि विजय कुमार शर्मा ने उज्जैन जाने के लिए 2 दिन का अवकाश प्रार्थना पत्र दिया था, लेकिन उरुक्रम शर्मा ने अवकाश देने से मना करते हुए यह कहा कि अवकाश लेना है तो परमानेंट अवकाश ले लो। और इस नौकझोंक के ठीक 3 दिन बाद विजय कुमार शर्मा का ट्रान्सफर भोपाल से बैंगलुरु कर दिया।

इसलिए हुए पत्रिका मालिकों पर अवमानना के सात केस दर्ज

पत्रिका से अपने हक की आवाज सबसे पहले उठाने वाले अमित मिश्रा और विजय कुमार शर्मा से जब प्रबन्धन के आला अधिकारी रघुनाथ सिंह ने केस करने का कारण पूछा तो इन दोनों ने स्पष्ट रूप से अरुण चौहान और उरुक्रम शर्मा का नाम लिया। इन दोनों का नाम लेने पर रघुनाथ सिंह ने इन पर कार्रवाई का आश्वासन दिया लेकिन अरुण चौहान और उरुक्रम शर्मा के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की। इसके परिणामस्वरूप पत्रिका के मालिकों पर सुप्रीम कोर्ट में केस नम्बर 572 के अलावा 6 केस और दर्ज हुए।

विजय शर्मा, पत्रिका कर्मचारी... मजीठिया केस के कारण पत्रिका प्रबंधन ने किया टर्मिनेट